मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने उज्जैन में बाबा महाकाल की सावन के महीने में निकलने वाली शाही सवारी के शाही शब्द को हटा दिया। उज्जैन में शाही के स्थान पर अब राजसी सवारी शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है। एमपी सीएम के इस कदम के बाद देश भर के संत समाज अब महाकुंभ में इस्तेमाल होने वाले शाही स्नान और पेशवाई शब्द को बदलने की मांग करने लगे हैं। बड़े मंचों पर इस मुद्दे पर रायशुमारी की जाने लगी है। शाही और पेशवाई का इस्तेमाल अक्सर कुंभ के संदर्भ में किया जाता है।
संतों की सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने कहा कि शाही शब्द भारतीय संस्कृति परंपरा में नहीं है। प्रयागराज में लगने वाले महाकुंभ में हम इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगे। इस मामले पर चर्चा करने के लिए जल्द ही अखाड़ों की बैठक बुलाई जाएगी। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी कहते हैं, शाही और पेशवाई शब्द गुलामी के प्रतीक हैं। मुगल शासकों द्वारा अपने गौरव को दर्शाने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता था। यह शब्द उर्दू-फारसी के हैं। जबकि, प्राचीन भारतीय सनातन की संस्कृति की भाषा संस्कृत है। जिससे हिंदी की उत्पत्ति हुई है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जब महाकाल की ‘शाही सवारी’ शब्द पर आपत्ति करते हुए उसे ‘राजसी सवारी’ नाम दिया तो हमारा ध्यान भी इस ओर गया। हम इसका विकल्प तलाशेंगे। महाकुंभ में शाही और पेशवाई शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
बता दें कि प्राचीन काल में ‘रॉयल’ के लिए ‘शाही’ या ‘राजसी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था। जबकि पेशवाई एक फारसी शब्द है। जिसका अर्थ है- किसी आदरणीय के आने पर बढ़कर स्वागत करना या आगवानी करना। इसके अलावा मराठा सम्राज्य के प्रधानमंत्रियों को पेशवा कहा जाता था। व राजा की सलाहकार परिषद के अष्टप्रधान के प्रमुख होते थे।
महाराष्ट्र सम्राज्य में पेशवाओं की शासनप्रणाली या शासन काल चलता था।
शाही-पेशवाई शब्द विवाद पर क्या बोले संत
हमारी परंपरा को नष्ट करना चाहते थे मुगल
वासुदेवानंद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य जगदगुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती कहते हैं कि मुगलों ने सनातन धर्म की संस्कृति व परंपरा को नष्ट करने का हर संभव प्रयत्न किया था। वह हर चीज का इस्लामीकरण करना चाहते थे। हमारी परंपराओं में उसी कारण उर्दू शब्द का प्रयोग होने लगा। अब उसे बदलने की जरूरत है। यह धर्म व राष्ट्रहित में है।उर्दू शब्द को बदलने की जरूरत
जीतेंद्रानंद अखिल भारतीय संत समिति व गंगा महासभा के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती कहते हैं, अखाड़ों के महात्माओं ने मुगलों से लड़कर सनातन धर्म व उसके धर्मावलंबियों की रक्षा की। उस दौर में उर्दू राजभाषा थी। अंग्रेजों के समय तक उर्दू का प्रयोग होता था। अखाड़ों की परंपरा में उर्दू शब्द का प्रयोग होने लगा। अखाड़ों के महात्मा सैनिक होते हैं। वे सर्वप्रथम आराध्य को स्नान कराते हैं, उसके बाद खुद करते हैं। ऐसे में उसे राजसी, देवत्व स्नान नाम दिया जाना चाहिए।खत्म होता है संतत्व व देवत्व का भाव
महेशाश्रम अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के संरक्षक जगदगुरु स्वामी महेशाश्रम ने कहा कि मप्र के मुख्यमंत्री ने महाकाल की सवारी का नाम बदलकर उत्कृष्ट कार्य किया है। संतों की परंपरा में उर्दू शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए। शाही स्नान और पेशवाई शब्द का प्रयोग अनुचित है। इससे संतत्व व देवत्व का भाव खत्म होता है।
क्यों प्रचलित हुआ शाही और पेशवाई
भाषा विशेषज्ञ कहते हैं- हर दौर के प्रचलित शब्द समाज के हो जाते हैं। चूंकि महाकुंभ पर मुगलकाल का असर था। मुगलों को हराकर जब मराठा सत्ता में आए तो उसका भी असर महाकुंभ पर आया। मराठा शासनकाल में फारसी शब्द पेशवाई खूब प्रचलित रहा। मुगल काल में हिंदी या संस्कृतनिष्ठ शब्द जनसामान्य के बीच प्रचलित नहीं थे। तब हिंदुस्तानी भाषा (हिंदी, अरबी, फारसी, तुर्की आदि) का प्रभाव अधिक था। हालांकि, कई संत शाही के स्थान पर राजसी शबद के इस्तेमाल पर भी सहमत नहीं हैं। कुछ संत चाहते हैं कि शाही और राजसी के स्थान पर सात्विक स्नान कहना उपयुक्त होगा। क्योंकि, संत-महात्मा सत् वृत्ति को धारण करते हैं, न कि रज और तम वृत्ति को। कुंभ में बाबा का दरबार लगा है… जैसे वाक्यों का खूब प्रयोग होता है। होर्डिंग और बोर्ड भी इसके लगते हैं। इसमें दरबार भी फारसी शब्द है। बाबा के दरबार का अर्थ मंत्रियों के दरबार सरीखा है, जो कि साधु-संतों के लिए कतई उचित नहीं है।
हिंदी में विदेशी भाषाओं के हजारों शब्द
हिंदी में विदेशी भाषाओं के हजारों शब्द हैं। आम बोलचाल में इनका इस्तेमाल हो रहा है। हजार, सरकार, साल, जादू, जिंदगी, जोर, जुलूस, चेहरा, चश्मा, आवाज, शादी, मकान, दरबार आदि फारसी के शब्द हैं। साइकिल, बैट्री, रेल, यूनियन, माचिस, गैस, अस्पताल, डॉक्टर आदि अंग्रेजी के शब्द हैं तो चाय, लीची शब्द चीनी हैं। रिक्शा जापानी शब्द है तो कॉफी, काजू, कप्तान, तंबाकू, चाबी, कमर, गमला पुर्तगाली शब्द हैं।
नेता भी मैदान में उतरे
इन दो शब्दों को लेकर संत समाज में ही सियासत नहीं हो रही है बल्कि नेता भी कूद पड़े हैं। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने संतों की मांग का समर्थन किया है। उनका कहना है कि संतों का कहना सौ फीसदी सही है। शाही और पेशवाई शब्द गुलामी का प्रतीक है। इसे हटाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कोई आपके घर पर कब्जा कर ले और जब आप शक्तिशाली होकर फिर से पर कब्जा प्राप्त करें तो उसके चिह्नों को मिटाएंगे या नहीं। मुगल और अंग्रेज आक्रांता थे। दोनों ने ही हमें लूटा,न केवल लूटा बल्कि लूट कर औरंगजेब रोड और बाबर रोड नाम भी रख दिया। केंद्रीय मंत्री का कहना है कि आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू को गुलामी के सभी ऐसे पद चिह्नों को मिटा देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया, ताकि तुष्टिकरण की राजनीति करते रहें।
फिलहाल, यह मामला गर्म है। देखना होगा कि प्रयागराज में सितंबर माह के अंत या अक्तूबर की शुरुआत में अखाड़ा परिषद की बैठक में कौन सा शब्द निकलकर आता है। किस शब्द पर सभी 13 अखाड़े मुहर लगाते हैं। बड़ी बात यह भी है कि अगर मुहर लग भी जाती है तो क्या जनमानस के दिमाग पर उसकी छाप पड़ती है।