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    Home»कवर स्टोरी»तीन जिलों से Ground Report: बदलाव की उड़ान को पंख
    कवर स्टोरी

    तीन जिलों से Ground Report: बदलाव की उड़ान को पंख

    बदलाव प्रकृति का नियम है। पहाड़ों के हर हिस्से में बदलाव के न जाने कितने किस्से हैं। teerandaj.com और अतुल्य उत्तराखंड की Ground Report में ये बात सामने आई कि अगर कोशिश सही दिशा में की जाए। संसाधनों का सही इस्तेमाल हो, लोगों को सही गाइडेंस मिले और प्रयास मिलकर किया जाए तो बदलाव कहीं भी, कभी भी बदलाव लाया जा सकता है।
    Arjun Singh RawatBy Arjun Singh RawatJune 11, 2024Updated:June 13, 2024No Comments
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    Ground Report: महिलाओं को उत्तराखंड की धुरी कहा जाता है। उनके बिना न तो इस राज्य की कल्पना की जा सकती है, न ही विकास, तरक्की और समृद्धि का सपना देखा जा सकता है। ऐसे में महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाने, स्किल्ड बनाने और उनके लिए स्थायी आजीविका के उपाय करने के उद्देश्य से शुरू हुआ नाबार्ड (NABARD) का आजीविका एवं उद्यम विकास कार्यक्रम …यानी एलईडीपी। ये कोशिश है महिलाओं के सामूहिक सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की…।

    क्या कभी किसी ने कल्पना की थी कि पहाड़ों में अपने रोजमर्रा के कामकाज तक सीमित महिलाएं एक दिन फुटवियर बनाने का काम करने लगेंगी। इसे बदलाव की बयार नहीं तो और क्या कहेंगे। अल्मोड़ा के चौखुटिया ब्लॉक में कई सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़ी महिलाएं ट्रेनिंग लेकर फुटवियर बना रही हैं। उन्होंने एक स्किल सीख ली है, जिससे उन्हें अच्छी कमाई भी हो रही है। आसपास के इलाकों में इन चप्पलों को काफी पसंद भी किया जा रहा है।

     

    NABARD के रीजनल ऑफिस उत्तराखंड के सीजीएम विनोद कुमार बिष्ट बताते हैं कि नाबार्ड की ओर से कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और इसमें हमारा विशेष फोकस महिलाओं के ऊपर है। आप जानते हैं कि हमारी खेती की जोतें काफी छोटी हैं, बिखरी हुई हैं, बहुत ज्यादा उत्पादन नहीं होता है, परंतु कई हमारी जो महिला किसान, आर्टिजन्स हैं, उन्हें अगर थोड़ा सा प्रशिक्षण दिया जाए तो वो बहुत अच्छा काम कर सकती हैं। नाबार्ड ने इस चीज को ध्यान में रखते हुए पिछले 10-12 साल से एमईडीपी और एलईडीपी योजना लांच की है, इसमें कई महिलाओं के छोटे-छोटे ग्रुप्स बनाकर उनको प्रशिक्षित किया जाता है। ये स्कीम फॉर्म सेक्टर के लिए भी और नॉन फॉर्म सेक्टर के लिए भी है। इसका मुख्य उद्देश्य होता है कि महिलाओं के अंदर दक्षता का विकास किया जाए। ताकि दक्ष होने के बाद ये अपना माल हाई रेट पर मार्केट में बेच सकें। हमारी कोशिश है कि आगे चलकर इनको ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे फ्लिपकार्ट, एमेजान के साथ जोड़ें। जिससे इनको एक हॉयर इनकम प्राप्त हो।

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    डीडीएम अल्मोड़ा गिरीश चंद्र पंत कहते हैं, पहाड़ों में खेती आजकल काफी चुनौतीपूर्ण हो गई है, जिसमें सबसे बड़ी समस्या जंगली जानवरों जैसे बंदर, सूअरों के आतंक की है। ये सभी गांवों में खेती करने वाली महिलाओं, पुरुषों को परेशान कर रहा है। तो नाबार्ड ने उम्मीद फाउंडेशन के साथ मिलकर ऐसे ऑप्शन की तलाश की कि जिसमें इन सारी समस्याओं से निजात मिले और कृषि से अलग कुछ हो। हमने स्लीपर बनाने का एक प्रोजेक्ट तैयार किया, महिलाओं ने भी इसमें रुचि दिखाई। हमने 90 महिलाओं को ट्रेनिंग दी और उन्हें एक्सपोजर विजिट भी कराई। उनको एग्जिस्टिंग यूनिट दिखाई गई, जिससे वो देखकर सीख पाएं। फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर के हिसाब से वो दो घंटे-तीन घंटे यूनिट में काम करके जो भी चप्पलें बना रही हैं, उन्हें लोकल मार्केट में सेल करके अच्छी आजीविका कमा रही हैं।

    महिलाओं ने जब आजीविका के साधनों से जुड़ना शुरू किया तो पहले पारंपरिक कामों को प्राथमिकता दी, फिर वो चाहे ऐपण में नए प्रयोग हों या फूड प्रोसेसिंग से जुड़ी पहलें। लेकिन अब बात इससे आगे पहुंच गई हैं, वो अपनी स्किल को लगातार बढ़ा रही हैं। अगर चौखुटिया में महिलाओं ने फुटवियर बनाने में दिलचस्पी दिखाई तो हल्द्वानी के आसपास के इलाकों में कई महिलाओं ने एलईडी बल्ब, झालर बनाना सीखा। अब वो न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, मेक इन इंडिया में भी योगदान दे रही हैं।

    डीडीएम नैनीताल मुकेश बेलवाल के मुताबिक, आजीविका एवं उद्यम विकास कार्यक्रम नाबार्ड की काफी पॉपुलर स्कीम है, इसका मुख्य उद्देश्य होता है कि जो महिलाएं एसएचजी से जुड़ी हैं, जो पहले से कुछ काम करती आ रही हैं, उनके पास जो बेसिक स्किल है, उसको कैसे अपग्रेड किया जाए। उसी के तहत हमने नैनीताल जिले में एलईडी लाइटिंग सिस्टम के ऊपर पिछले साल एक एलईडीपी सेक्शन किया था। इस ट्रेनिंग के दौरान हमने हल्द्वानी और कोटाबाग ब्लॉक में 90 महिलाओं को चिन्हित किया। इन महिलाओं को हमने अलग-अलग बैच में ट्रेनिंग दी। हमने तीन बैच बनाए, एक बैच में 30 महिलाएं थीं। इस तरह हमने इस प्रोग्राम के तहत 20-20 दिन की ट्रेनिंग दी। इसके बाद हमने उन्हें कुछ ऐसी फैक्ट्रीज में एक्सपोजर विजिट कराया, जहां आलरेडी ये काम चल रहा है। जब ट्रेनिंग करके महिलाएं आईं तो उन्होंने बैलपड़ाव में अपना एक यूनिट एस्टेबलिस्ट किया। हमारा अभी एक साल ही हुआ है और अगर इसके सक्सेसफुल मॉडल की हम बात करें तो महिलाओं के पास अच्छे आर्डर आ चुके हैं। वो अपने स्तर पर काम कर रही हैं, मेलों में हिस्सा ले रही हैं। बैंकों द्वारा इनके लिए 5 लाख, 10 लाख के लोन सेंक्शन किए गए हैं। अपने आप में ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि हो चुकी है।

    बदलाव की उड़ान को पंख

    जब नाबार्ड की ओर से आजीविका बढ़ाने के अवसर मुहैया कराए जा रहे हों तो ऊधमसिंह नगर की महिलाएं भला कहां पीछे रहने वाली थीं… जरा सोचिये ग्रामीण इलाकों की ये महिलाएं आज घर से ही डिजाइनर आउटफिट बना रही हैं। बाजपुर के बरहैनी में एसएचजी की महिलाओं ने फैंसी गारमेंट्स डिजाइनिंग की ट्रेनिंग लेकर अपने लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल दिए हैं।

    डीडीएम ऊधम सिंह नगर राजीव प्रियदर्शी ने बताया कि एलईडीपी के अंतर्गत महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाता है। हमने बाजपुर के बरहैनी ग्राम पंचायत से 90 महिलाओं का चयन किया और उनको फैंसी गारमेंट्स मेकिंग की ट्रेनिंग दी। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमने यहीं के एक स्थानीय एनजीओ प्रगतिशील युवा ग्रामीण समिति का चयन किया। उनके माध्यम से हमने 90 महिलाओं को 15 दिन की ट्रेनिंग 3 बैच में पूरी कराई। ट्रेनिंग के बाद देखा गया कि कई महिलाओं ने अपनी शॉप्स खोल ली हैं, कुछ अपने घर से ही सिलाई का काम कर रही हैं। वो अपने प्रोडक्ट्स को स्थानीय बाजार और मेलों के माध्यम से बेच रही हैं।

    बाजपुर के बरहैनी में शशि रावत की प्रगतिशील संस्था महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण देती हुई।

    इन सैकड़ों चेहरों पर मुस्कान की वजह बना है नाबार्ड का आजीविका एवं उद्यम विकास कार्यक्रम। ये न सिर्फ लोगों की आजीविका बढ़ाने के लिए एक व्यापक सहयोग तंत्र विकसित करने का प्रयास है, बल्कि स्थायी आजीविका की गारंटी है।

    यहां हमने बहुत अच्छे से सीखा कि फुटवियर कैसे बनाते हैं। हम इनको बेचते भी हैं। हमको इसकी काफी जानकारी हो गई है। अब हमें बैंकों की जानकारी भी हो गई है, पहले हमें बैंक जाने में डर लगता था कि बैंक कैसा होगा, वहां क्या होगा। आज हम बैंकों में जाते हैं, अपना काम खुद करके आते हैं जैसे पैसे निकालना, डालना, पासबुक में एंट्री कराना। हम इसके बारे में सबकुछ जान गए हैं। यहां आके हम चप्पल भी बनाते हैं, हमें अच्छा लगता है। – दीपा गोस्वामी, चौखुटिया, अल्मोड़ा 

    हमें यहां पर काम करना अच्छा लगता है। हमारी जो आजीविका होती है, उससे हमारा घर-परिवार चलता है। हम एक कदम आगे चले हैं और हम चाहते हैं कि इससे भी बेहतर करें। सबसे अच्छी बात है कि हमारा लोकल प्रोडक्ट है। आजकल कहा जा रहा है कि लोकल का प्रोडक्ट लोकल में ही चले। हम इस पर काम करते हैं और हमारे समाज के लोगों को भी अब लगता है कि ये छोटा कामधंधा नहीं है, ये बहुत अच्छा काम है। लोग आते भी हैं, हमारी चप्पलें यहां से खरीद ले जाते हैं। 25 महिलाएं पास-पड़ोस से यहां चप्पलें बनाने आती हैं। वे यहां से चप्पलें ले जाती हैं, उनके आस-पड़ोस के लोग उनसे चप्पलें मंगाते भी हैं। – कमला बिष्ट, चौखुटिया, अल्मोड़ा

    मैंने 2019 में गिरिजा बूटीक से जूट के बैग की ट्रेनिंग ली थी। उसके बाद हम नाबार्ड से जुड़े और नाबार्ड ने हमें बहुत सपोर्ट किया। हर जगह पर स्टॉल भी दिलाए, जिससे हम अर्निंग करते थे। हम महिलाएं घर में ही रहती थीं, उसके बाद नाबार्ड ने हमें एलईडी बनाने की ट्रेनिंग दी। हमने पांच लाख का लोन लिया और आजकल हम एलईडी का काम कर रहे हैं। हमारे ग्रुप की सभी महिलाओं ने ट्रेनिंग ली और घर पर एक-दो घंटे देकर एलईडी बनाने का काम कर रही हैं। सब लोगों का सपोर्ट हमारे लिए बहुत ज्यादा रहता है, क्योंकि महिलाएं अभी इससे नहीं जुड़ी हैं, एलईडी का काम महिलाओं के लिए अलग चीज है। – नीलम पंत, हल्द्वानी, नैनीताल

    अभी गिरिजा बूटीक द्वारा हमें नाबार्ड की तरफ से एलईडी का प्रशिक्षण दिया गया था। इसमें हमने एलईडी बल्ब बनाने सीखे, बिजली की झालर बनानी सीखीं, एलईडी से रिलेटेड कई चीजें बनानी सीखीं। कई महिलाओं को इससे फायदा हुआ। महिलाएं इससे जुड़कर अपनी अर्निंग बढ़ा रही हैं। कई महिलाओं ने दुकाने खोली हैं, वो अपनी एलईडी की सेल कर रही हैं। हम लोग भी इससे अपना जीविकोपार्जन बढ़ा रहे हैं, घर में अपनी फैमिली को सपोर्ट कर पा रहे है। इससे लिविंग स्टैंडर्ड बढ़ेगा और आगे हम इसको रोजगार के तौर पर अपनाकर इससे काफी अर्निंग करेंगे और अपनी सेल बढ़ाएंगे। – सुनीता तिवारी, हल्द्वानी, नैनीताल

    मैंने नाबार्ड के सहयोग से प्रगतिशील संस्था से 15 दिन की ट्रेनिंग ली है। पहले हम नॉर्मल सिलाई करते थे, सूट सिलते थे। फिर हमने 15 दिन का फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया। लहंगे, ब्लाउज जैसा बहुत कुछ हमें सिखाया गया, जो हम सिलते हैं। अब गांव के लोग आते हैं और हमसे सिलवाई करवाते हैं। पहले उनको दूर शहर जाना पड़ता था, अब लोग हमारे पास आते हैं, उनके लिए बहुत सुविधा हो गई है। मेरे साथ चार और महिलाओं ने ट्रेनिंग ली है। ये भी मेरे साथ ही काम करते हैं। इससे हमें थोड़ा कमाई हो जाती है, हमें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता है। हम अपने खर्चे से ही अपना काम करते हैं। – सविता, बाजपुर, यूएस नगर

    हमें 15 दिन की ट्रेनिंग दी गई थी, जिसमें हमें प्लाजो, लहंगा, गाउन जैसी फैंसी ड्रेसें सिखाई गईं। अब हम ग्रुप के साथ मिलकर काम करते हैं। हमें बहुत अच्छी कमाई होती है, हमें किसी से लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। हम बैंक का लेनदेन भी करते हैं, खुद से हम बाहर भी जाते हैं। हमें किसी से कुछ लेने की जरूरत नहीं पड़ती है, हमारा बहुत अच्छा काम है। – सरबजीत कौर, बाजपुर, यूएस नगर

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    Arjun Singh Rawat
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    पत्रकारिता का लंबा करियर। एजेंसी,टीवी, अखबार, मैग्जीन, रेडियो और डिजिटल मीडिया का अनुभव। राष्ट्रीय मीडिया में 15 साल काम करने के बाद पहाड़ों का रुख। पहाड़ के मुद्दों पर खुलकर बोलने का दम। जमीन पर काम करने का जज़्बा और जुनून आज भी वैसा ही, जैसा पहले दिन था।

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