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    ओपिनियन

    Emergency के 50 साल… भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय

    1975 में देश में आपातकाल लगाया गया था। 25 जून 1975 मे लगी इमरजेंसी 21 मार्च 1977 यानी पूरे 21 महीने चली थी। आपातकाल को इस साल 50 साल पूरे हो रहे हैं, लेकिन लोगों के जहन में इतिहास का वो काला स्याह अध्याय आज भी जिंदा है।
    teerandajBy teerandajJune 24, 2025Updated:July 15, 2025No Comments
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    • पार्थसारथी थपलियाल –

    1971 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में रायबरेली संसदीय क्षेत्र से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ा था। उनके प्रमुख प्रतिद्वंदी थे सोशलिस्ट पार्टी के नेता राज नारायण। चुनाव मार्च महीने में कराए गए थे। इंदिरा गांधी को सांसद निर्वाचित घोषित किया गया, लेकिन हारने वाले निकटतम प्रतिद्वंदी राज नारायण ने चुनावों में धांधली और अनियमितताओं को आधार बनाकर एक याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल की। इस मामले में न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने उच्च न्यायालय का फैसला 12 जून 1975 सुनाया। उन्होंने अपने निर्णय में इंदिरा गांधी पर लगाए गए आरोपों को सही ठहराया। उन्होंने इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द घोषित करते हुए उन पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया। मामला तुरंत सर्वोच्च न्यायालय गया।

    24 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि वे प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती हैं लेकिन वे संसद में मतदान में भाग नहीं ले सकतीं। उन दिनों देश के बड़े भाग में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के विरुद्ध स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में छात्र आंदोलन चल रहा था। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द किए जाने के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनके पद से त्यागपत्र की मांग करने में जय प्रकाश नारायण भी विपक्षियों के साथ शामिल हो गए। 25 जून 1975 को प्रधानमंत्री के निवास 1, सफदरजंग रोड पर दिन भर सलाहों का दौर चलता रहा। उनकी सलाहकार मंडली में उनके प्रमुख सचिव पीएन हक्सर, निजी सचिव आरके धवन और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे शामिल थे। अनेक विकल्पों पर विचार किया गया। सिद्धार्थ शंकर रे का यह विचार था कि संविधान के अनुच्छेद 252 का उपयोग करते हुए आंतरिक आपातकाल घोषित कर दिया जाए। बताते हैं कि इंदिरा गांधी ने एक बार पद से त्यागपत्र देने का मन बना लिया था।

    इस विचार के बाद संविधान विशेषज्ञों से विमर्श होता रहा। अंततः रात पौने बारह बजे आपातकाल (Emergency) घोषित करने संबंधी पत्र राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास हस्ताक्षर के लिए भेज दिया गया। जिस पर उन्होंने तुरंत हस्ताक्षर कर देश में आपातकाल घोषित कर दिया। तानाशाही और यातनाओं का दौर उन दिनों समाचारपत्र वास्तव में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की तरह व्यवहार करते थे। आपातकाल घोषित होने पर प्रधानमंत्री के पास तानाशाही शक्ति आ चुकी थी। सरकार ने पहला प्रहार प्रेस पर किया। रात को जब दिल्ली से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्रों के सिटी एडिशन छपने का समय होता है, बहादुरशाह जफर मार्ग पर स्थित समाचार पत्रों की बिजली काट दी गई ताकि अखबार सुबह-सुबह लोगों तक न पहुंच सके। समाचारपत्र समय पर प्रिंट न होने के कारण लोगों तक आधे अधूरे ही पहुंचे थे। समाचार पत्रों के अलावा विश्वसनीय समाचार प्राप्त करने का एक मात्र माध्यम आकाशवाणी से प्रसारित समाचार होते थे। आकाशवाणी से सुबह 8 बजे 10 मिनट का हिंदी समाचार बुलेटिन और उसके बाद अंग्रेजी बुलेटिन प्रसारित होता था। 26 जून 1975 को सुबह 8 बजे के समाचार बुलेटिन में पहला ही समाचार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के स्वर में था, राष्ट्रपति जी ने देश में आपातकाल की घोषणा की है। इससे घबराने की कोई बात नहीं…।

    दिल्ली में कांग्रेस विरोधी दलों के नेताओं को 25/26 जून की रात को सोते हुए उठाया गया और गिरफ्तार कर थाने में ले जाया गया। कोई नहीं जानता था कि उनका अपराध क्या है। जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, मदनलाल खुराना, चौधरी चरण सिंह, राजनारायण, रामधन, कृष्णकांत, चंद्रशेखर, मधु दंडवते जैसे दर्जनों राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को उसी रात गिरफ्तार कर लिया गया। अगले दिन यह अभियान देश भर में चला। देश भर में 676 राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को लगभग 19 माह तक जेलों में बंद रखा गया। कुछ लोगों को आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (मीसा) के अंतर्गत और कुछ को भारत रक्षा अधिनियम (डीआईआर) में गिरफ्तार कर जेलों में भेज दिया गया। भारतीय राजनीति में प्रखर व्यक्ति डा. सुब्रमण्यम स्वामी अपना हुलिया बदलकर अहमदाबाद पहुंच गए थे। स्वामी को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का काम उस समय संघ के कार्यकर्ता और आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। मोदी सिख वेशभूषा में भूमिगत कार्यकर्ता थे। स्वामी उस समय चुपचाप भारत से बाहर निकल गए थे। बाद में एक समय ऐसा भी आया जब सुब्रमण्यम स्वामी बदली वेशभूषा में संसद की कार्यवाही में भाग लेने आए। सुब्रमण्यम स्वामी का संसद में आना, अपना भाषण करना और अदृश्य हो जाना, आपातकाल के दौरान की घटनाओं में एक जासूसी उपन्यास में वर्णित घटना की तरह है। सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिखे पत्र, जय प्रकाश नरायण द्वारा लिखे पत्र, संघ प्रमुख बाला साहेब देवरस द्वारा लिखे पत्र की प्रति संघ के भूमिगत कार्यकर्ताओं ने देश भर में गुप्त तरीकों से पहुंचाई।

    तानाशाही कारगुज़ारी में सबसे पहला काम था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाना। आपातकाल लगते ही सबसे पहले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) पर रोक लगा दी गई। मौलिक अधिकारों में संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) छोड़कर सभी पर रोक लगा दी गई। 42वें संशोधन के अंतर्गत भारतीय संविधान में अनेक परिवर्तन किए गए। संविधान (बयालीसवां संशोधन) विधेयक 1976 के माध्यम से संविधान की आत्मा कहे जाने वाले मिनी संविधान ( संविधान की प्रस्तावना) में भारी बदलाव किया गया। संसद के अधिकतम विपक्षी सांसद जेलों में बंद थे। कुछ सदस्य वे थे, जो विपक्षी नाम मात्र के थे, अंदरूनी तौर पर वे भी जयकारा लगाने वाले थे। इस संशोधन में लोकसभा एवं विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया। संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े गए। राष्ट्रीय एकता के साथ अखंडता शब्द को भी जोड़ा गया। सरकार की समस्त शक्तियां प्रधानमंत्री पर केंद्रित हो गई। न्यायपालिका की शक्तियों को कम करने के प्रयास किए गए। लोकतांत्रिक अधिकारों में कमी की गई, राज्य सूची में वर्णित कार्यों में कुछ विषयों को समवर्ती सूची में लाया गया। संविधान के 38वें संशोधन में प्रावधान किया गया कि नए संशोधनों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।

    अत्याचारों और अमानवता की पराकाष्ठा
    4 जुलाई 1975 को आरएसएस सहित 26 संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ के कार्यालयों को सील कर दिया गया। संघ के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ शुरू की गई। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी तानाशाही सत्ता प्रमुख केन्द्र थे। संजय गांधी ने आपातकाल में पांच सूत्री कार्यक्रम चलाया था। उनमें से एक सूत्र परिवार नियोजन (नसबंदी करवाना) भी था। नसबंदी के लक्ष्य पाने के लिए आम जनता के ऊपर अत्याचार ढाए गए। ऐसी जबरन नसबंदियां करवाई गई जिनमें लोक-लाज और सामाजिक मर्यादाओं को भी ताक पर रख दिया गया। कोई 16 वर्ष का किशोर या कोई 80 वर्षीय बुजुर्ग, किसी का ध्यान नहीं रखा गया। जो मिला उसकी नसबंदी करा दी गई। एक ही व्यक्ति की अलग-अलग दिन कागजों में नसबंदी। सरकारी पदाधिकारियों को नसबंदी कराने के लक्ष्य दिए गए। टॉरगेट पूरे करने के लिए अधिकारी आम लोगों का मान मनौव्वल करने से लेकर साम, दाम, दंड, भेद, हर तरह से लगे रहते थे।

    अत्याचार ऐसा कि हनीमून मनाने गए जोड़े को भी नहीं छोड़ा गया। उन दिनों शासनादेश न मानने पर तुरंत कार्रवाई होने का भय मंडराता रहता था। यहां तक कि भिखारियों, मांगकर खाने वालों और विक्षिप्त लोगों की भी नसबंदी करा दी गई। क‌‌ई स्थानों पर यात्रियों से भरी बसों से लोगों को नसबंदी कैंप में ले गए। इन आंकड़ों से पता चलता है कि लोगों में आपातकाल का कितना खौफ रहा होगा। वर्ष 1975-76 में नसबंदी ऑपरेशंस की कुल संख्या 27 लाख थी, जो 1976-77 में 83 लाख हो गई। अत्याचारों के विरुद्ध किसी थाने में या न्यायालय में शिकायत भी नहीं की जा सकती थी। देशभर में आरएसएस के एक लाख ग्यारह हजार कार्यकर्ताओं को अकारण जेलों में बंद रखा गया। आपातकाल में दौरान पुलिस प्रताड़नाओं के कारण 53 लोगों की जानें गई। आपातकाल में कुछ काम अच्छे भी हुए जैसे – कालाबाजारी और मिलावटखोरी करने से से समाज कंटक डरने लगे थे। सरकारी दफ्तरों में कार्यालय समय में उपस्थिति में आशातीत वृद्धि हुई।

    लोक संघर्ष समिति का ताना-बाना
    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हजारों स्वयंसेवकों को अकारण जेलों में ठूंस दिया गया था। संघ के लाखों कार्यकर्ता बाहर भी थे, जो बाहर थे उन्होंने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए दिन और रात काम किया। संघ के सरकार्यवाह (जनरल सेक्रेटरी) माधवराव मूले, जो उचित समय पर भूमिगत हो चुके थे, उन्होंने जगह-जगह अपने कार्यकर्ताओं से संपर्क साधा और कुछ ही समय में लोकसंघर्ष समिति सक्रिय हो गई। भूले जी लोकतंत्र संघर्ष समिति के स्वत: संयोजक थे। स्वाधीनता आंदोलन से अधिक बर्बरता जिस शासनकाल में रही हो उसके विरुद्ध लोगों में जागरूकता लाना बहुत बड़ा जोखिम भरा काम था। रा.स्व. सेवकसंघ ने राष्ट्र के लिए किए गए कार्य को अपना धर्म माना और   का श्रेय लेने का कहीं प्रयास नहीं किया। जो लोग जेलों में थे, उनकी तो दिनचर्या निश्चित हो गई थी लेकिन जो लोग भूमिगत कार्यकर्ता थे, वे पुलिस की धर पकड़ की आशंकाओं के बीच अनेक प्रकार के कार्यों से जुड़े हुए थे। उनके दायित्व में जेलों में बंद कार्यकर्ताओं के परिवारों से संपर्क करना, आवश्यकता पड़ने पर उनकी आर्थिक और सामाजिक सहायता करना, पारस्परिक संपर्क को बढ़ाना, बड़े कार्यकर्ताओं की बैठकें तय करना, अज्ञात स्थानों पर बदली वेशभूषा में रहना, संघर्ष, चुनौती, अन्य नामों से गुप्त स्थानों से साइक्लो स्टाइल पत्रक निकालना, उनके वितरण के लिए विश्वसनीय कार्यकर्ताओं को कोडवर्ड में समझाना और दिए गए निर्देशों का पालन करना।

    पेड़ पर चढ़े व्यक्ति को अंततः नीचे उतरना ही होता है। यही बात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी लागू होती है। 18 जनवरी 1977 को आकाशवाणी से रात पौने नौ बजे के समाचार बुलेटिन में प्रमुख समाचार यह था कि राष्ट्रपति जी ने प्रधानमंत्री की सलाह पर लोकसभा भंग कर दी है, नई लोकसभा गठन के लिए आम चुनाव मार्च में कराए जाएंगे। कुछ ही दिनों में सभी राजनीतिक बंदियों को जेलों से रिहा कर दिया गया। चुनाव आयोग ने निर्वाचन कार्यक्रम घोषित किया। इस बीच जय प्रकाश नारायण की अगुवाई में विपक्षी दलों में एकता के प्रयास किए गए। दलों में सहमति बनाई गई। समय कम होने के कारण सहमत दल अपने अपने दलीय चिन्हों पर चुनाव लड़े। मतदान 16 मार्च से 19 मार्च के मध्य हुआ। 20 मार्च को चुनाव परिणाम घोषित किए गए। विपक्ष अब सत्तापक्ष बन चुका था। नए राजनीतिक दल का निर्माण हुआ। पार्टी का नाम रखा गया जनता पार्टी। 1977 के चुनावों में जनता पार्टी को 295 सीटें मिली। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 154 सीटों पर संतोष करना पड़ा और इस तरह अत्याचार हारा, लोकतंत्र जीत गया।

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